सोमवार, 11 मई 2020

सरकारी स्कूल v/s कॉन्वेंट स्कूल , अभिनव प्रयोगों का दौर


#मन_की_बात________!
#सार्वजनिक अर्थात सरकारी शिक्षकों के बारे में एक आम धारणा बनती चली गई है कि वे सरकार के स्कूल में नहीं पढ़ाते ? अब यह धारणा कैसे बनती चली गई ? क्यों बनती चली गई? काहे बनती चली गई ? इस धारणा को बुनने के पीछे सरकार के कौन_कौन से नीति निर्धारक तत्व जिम्मेदार हैं, यह भी पता लगाना जरूरी होता है एवं इन पर विचार विमर्श की जरूरत है। सरकार ने क्या कभी चाहा कि सबको एक समान शिक्षा मिले, समाज ने कभी सोचा कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा हमसे दूर क्यों जा रही है? अभिभावकों ने कभी सोचा कि आज इन अंग्रेजी माध्यमों में पढ़कर उनके बच्चों का नैतिक पतन कैसे होता जा रहा है और क्यों होता जा रहा है?
बिहार के समस्तीपुर जिले में मध्य विद्यालय सिवैसिंहपुर


#यहां, मैं यह जानकारी देना चाहूंगा कि सरकारी सरकारी विद्यालयों में पढ़ने लिखने के अलावे सरकार द्वारा प्रायोजित अनेक गतिविधियां संचालित की जाती है जिनमें शिक्षकों की अनन्य सहभागिता होती है जिससे शिक्षक अपनी पूरी तन्मयता से अपना पूरा ध्यान नहीं दे पाते।  इन सब उल_जूलुल कार्यों के लिए सरकार ही ज़िम्मेदार है। सरकार के शिक्षक सरकार द्वारा प्रायोजित लोक_लुभावन वोट बढ़ावन कार्यों को करते रहे कि बच्चों के बीच अपना कीमती समय बिताएं ?
#शिक्षा में आजतक जितने भी प्रयोग किए गए हैं शायद ही किसी अन्य क्षेत्र में इतने प्रयोग किये गए और यह भी सत्य है कि जितने अधिक अभिनव प्रयोग हुए, शिक्षा का उतना ही बेड़ागर्त होता चला गया एवं सबसे बड़ी बात यह है कि सार्वजनिक शिक्षा हो या सीबीएसई बोर्ड हो या आईसीएसई बोर्ड हो, सब की हालत एक ही जैसी ही है।
#आश्चर्य है!अंग्रेजी मीडियम के नाम पर खुलने वाले कुकुरमुत्तों की तरह उन तमाम स्कूलों में अंग्रेजी मीडियम के नाम पर बच्चों का ब्रेन ड्रेन होने और उनके अभिभावकों का आर्थिक शोषण होने के अलावे और कुछ भी नहीं होता। इन प्राइवेट विद्यालयों में एक_दो हज़ार की पुस्तकें अभिभावक चार_चार हज़ार में खरीदते हैं, अप्रशिक्षित शिक्षकों से अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाते हैं,

लेकिन अपनी चुनी हुई सरकार से प्रश्न नहीं कर सकते कि बाक़ी के हमारे पैसे किसकी कफ़न के जेबों में जा रहे हैं ?#अप्रशिक्षित_अल्पज्ञ लोगों से हमारे बच्चे को शिक्षा क्यों दिलवाया जा रहा है ? वहीं दूसरी तरफ शिक्षा आनन_फानन में वैसे लोगों द्वारा दी जा रही है जिनको यह भी नहीं पता कि शिक्षा देने_लेने का काम मुझसे मजदूरों से भी कम दाम देकर काम करवाया जा रहा है। सनद रहे शिक्षा देना और शिक्षक होना कोई बेरोज़गारी मिटाने का साध्य और साधन नहीं कि जिसको मन हो गया ,शिक्षा देने_ लेने लगे।

#इस अंग्रेजी शिक्षा ने इस देश के बाल मस्तिष्कों को इस तरह रटंत विद्या की आदत लगवा दिया जिससे बच्चों की सोचने समझने की शक्ति जाती रही। अब बच्चे रट_रट कर बैंकर, आईएएस, आईपीएस एवं अन्य कोई भी कंपटीशन निकालते जा रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं बनते क्योंकि वैज्ञानिक बनने के लिए समझ का विकसित होना जरूरी होता है जो हमारी शिक्षा पद्धति बच्चों में नहीं होने दे रही है।
#आश्चर्य है ! एक बच्चा जो सामाजिक विज्ञान के प्रश्नों को अपनी मातृभाषा में तो बड़ी कुशलता से जवाब देता है लेकिन उन्ही प्रश्नों के उत्तर वह विदेशी भाषा में ठीक से नहीं दे पाता क्योंकि उसकी समझ उस भाषा में नहीं बनती ।कभी गांधी, टैगोर ने भी कहा था कि मातृभाषा  बच्चों को शिक्षा देने का सशक्त माध्यम है, मातृभाषा को छोड़कर बाकी कोई भी भाषा यदि बच्चों के कक्षा कक्ष में प्रेरित किया जाता है तो यह बच्चों के लिए सरासर अन्याय है।
#सार्वजनिक विद्यालयों के बच्चे अपने परिवार के पहले जनरेशन  के बच्चे हैं जो विद्यालय आ रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे अपने घर के सारे काम करते हुए विद्यालय आते हैं। उनके अभिभावक भी इतने पढ़े लिखे नहीं कि उन पर वह  उचित ध्यान दे सकें...........!


राहुल_कुमार
#सार्वजानिक_प्राइमरी_विद्यालय_का_एक_प्रयोगधर्मी_

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