शनिवार, 6 जून 2020

बच्चों की जिंदगी खतरे में डालना ग़लत , रायशुमारी प्राइवेट स्कूलों के दवाब में ।


नम्रता


जब वाहवाही का लहू मुँह लग जाए तो फिर आम राय मशविरा मायने नहीं रखती। वही हाल है हमारे लोकतंत्र में भागीदारी निभाने वाले नेताओं की। कहने को तो लोकतांत्रिक सरकार चला रहे परंतु कहते हैं संकट की घड़ी में अपने परायों का इल्म हमें होता है " वही बात है यहाँ कि बच्चों के शिक्षा के नाम पर हो रही सियासत दरअसल चौखट पर दस्तक दे रहा चुनाव के मद्देनज़र खानापूर्ति को विद्यालय खोलने के लिए हमारी राय महज़ स्टंट से ज्यादा कुछ और नहीं। 


हमारी सरकार को शिक्षा की चिंता कबसे हो रही। कहिये न कि निजी संस्था के दबाब में आप सरकारी स्कूल और निजी विद्यालयों के बच्चे और अभिभावक के जान को सकते में डालने का हर संभव प्रयास में लग रहे। 


अब चलते हैं कुछ ऐसे पहलुओं पर जो जानना आवश्यक है। 
क) अगर जानना ही था कि सबकी राय क्या है तो उस राजा की तरह बनते जो वेष बदलकर अपनी जनता का दुख सुना करता था। 

ख) निजी विद्यालयों के अभिभावक खुले आम ट्वीटर पर हैशटैग चला रहे #noschooluntilcorona , वो अपने बच्चों को लेकर प्री एडमंट हैं कि नहीं भेजना है उन्हें उनके बच्चों को स्कूल लेकिन उन सरकारी स्कूल के गरीब बच्चों का क्या जो कि कोरोना काल में भी गांव के इलाके में बिना मास्क के दिन भर घूम रहे। गांवों में इतना भी लोगों को पता नहीं कि कोरोना कैसे फैल रहा,वो भी तब जब बिहार में लगातार प्रवासियों के आने से कोरोना केस बढ़ रहा। (रिपोर्ट के मुताबिक) 

ग) जब हमारे शिक्षक ही कोरोना को लेकर जागरूक नहीं क्योंकि इसका प्रमाण मैं खुद हूं कि शिक्षक एक पैसा जागरूक नहीं हैं तो आप बच्चों से क्या अपेक्षा करेंगे। उसमें भी जब जुलाई अगस्त जैसे उमस भरे मौसम का आना बाकी है और दिनभर आप मास्क में बच्चों को किस तरह रखेंगे। और शिक्षक जबरन लगवाए भी तो वो मास्क खरीदेंगे कैसे जब वो अभावग्रस्त रहते हैं। उसमें भी बिहार के बच्चे तो चमकी से भी मरते हैं तो यहाँ के लोग भगवान का कहर मान सरकारों को दोषमुक्त कर फिर से वोट देने चले जाते हैं। हां वैसे सरकारों को जमीर कब से होने लगा जो मरेगी। 

घ) आप अपने कर्मचारियों, पदाधिकारीयों से और आम जनता व बच्चों से ये सवाल पूछ रहे तो आप ही ये बताएं कि कोरोना के इस आर्थिक संकट के काल में किसको अपनी नौकरी गवानी है कि वो सही सुझाव आपको देंगे। वैसे भी बिहार के विद्यालय में शिक्षक, कर्मचारी और रसोइया सब स्कूल जा ही रहे तो फिर दुश्मनी किससे निकाल रहे! 

च) लगभग कई रायशुमारी के रिपोर्ट का अवलोकन में 100% जवाब एक ही है कि जो स्कूल का आम दिनों का रूटीन है ठीक उसी को फौलो किया जाय तो फिर इसका यही मतलब है कि कोरोना समाप्त हो गया और स्कूल खोलने का निर्णय आप सभी के मत्थे मढ़ देना चाह रहे यदि कोई अनहोनी घटे। 

छ) कोई भी सरकार से सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता क्योंकि निष्कासित का दंस जो झेलना पड़ेगा। 

ज) वैसे भी बिहार सरकार को वाहवाही लूटकर रिकार्ड बनाने की लत लग चुकी है। लाॅक डाउन में मैट्रिक का रिज़ल्ट देना, एक सप्ताह में परीक्षा फल जारी करना, मानव श्रृंखला बनाना। आपको भी पता है जिह विद्यालय में आम वार्षिक रिज़ल्ट 25-30% नहीं होता वहीं +2 और मैट्रिक का रिज़ल्ट 85% होता है। 

झ) भूख और चिकित्सा में निचले पायदान पर रहने वाला हमारा देश कोरोना में जल्द ही टाॅप पर पहुंच जाएगा क्योंकि देखते देखते छठे नंबर पर आ चुका है तब आप बच्चों को स्कूल बुला रहे। शिक्षा सरकारी ऐजेंडा में योजना से ज्यादा ग्यारह साल( शिक्षा का अधिकार)  से कुछ और नहीं ये सभी को पता है। 

ट) लगता है कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच आपसी सामंजस्यता का घोर अभाव है तभी शिक्षा मंत्री कह रहे कि सितंबर से पहले विद्यालय नहीं खुलेंगे और राज्य सरकार की बौखलाहट देखें तो मिड जून से नामांकन प्रारंभ करने का मन रहे और जुलाई से विद्यालय में पठन-पाठन आरंभ( यही सभी की राय है) मतलब हम जनता के लिए एक विशेषण देना हो तो आप देना पसंद करेंगे। 

ठ) जहां 6/6, 8/8 का क्लास रूम में पचास बच्चे ठूसे जाते हैं और तो और कई भवनहीन विद्यालय भी चल रहे, कई विद्यालय एक वरामदे पर 1-8 तक की कक्षा एक शिक्षक के द्वारा संचालित होती है वहीं शहर से या दूर दराज़ से आने वाले शिक्षक ही कोरोना पाॅजिटिव हों तो ऐसे में क्या होगा। क्या शिक्षक कोरोना नहीं फैला सकते? 

आप तो ये भी मानने को तैयार नहीं थे कि बिहार में कोरोना मरीज़ है। अगर जनता कर्फ्यू के दिन पटना में कोरोना मरीज़ की मौत को छिपा सकते थे तो आप ये छिपा जाते कि बिहार में भी कैरोना पाॅजिटिव है सच कोई नहीं बोलता है। सभी गलत सलाह देते हैं वो भी मौका की नज़ाकत और सलाह मांगने वाला कौन हो तो फिर वो खानापूर्ति के सिवाय कुछ नहीं होता है। जब देश और विद्यालय बंद करने से पहले नहीं पूछा गया तो अब ये नाटक क्यों। 

         विद्यालय खोलने के लिए किसी सरकार के पास अभी कोई किसी तरह की तैयारी नहीं है। न ही कोरोना के लिए दवाई ही बन पायी है और जिस तरह ये दिन दुनी रात चौगुनी मरीज़ की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा तो ये कहना उचित होगा कि देश के भविष्य को मौत के मुँह में न ढकेलें। जो संभालनी है वो है अर्थव्यवस्था और उसके लिए जितनी राय लेनी है आप साल भर मांगते रहें कोई प्रश्न चिह्न नहीं आपके मनसा के ऊपर लगाएगा लेकिन इतना बड़ा निर्णय के लिए आम मत मांगना घोर अपराध के अलावा कुछ नहीं होगा क्योंकि कई देश बच्चों पर प्रयोग कर निर्णय वापस ले रहे। कहीं आप भस्मासुर न साबित हो जाएं।।


सोमवार, 11 मई 2020

सरकारी स्कूल v/s कॉन्वेंट स्कूल , अभिनव प्रयोगों का दौर


#मन_की_बात________!
#सार्वजनिक अर्थात सरकारी शिक्षकों के बारे में एक आम धारणा बनती चली गई है कि वे सरकार के स्कूल में नहीं पढ़ाते ? अब यह धारणा कैसे बनती चली गई ? क्यों बनती चली गई? काहे बनती चली गई ? इस धारणा को बुनने के पीछे सरकार के कौन_कौन से नीति निर्धारक तत्व जिम्मेदार हैं, यह भी पता लगाना जरूरी होता है एवं इन पर विचार विमर्श की जरूरत है। सरकार ने क्या कभी चाहा कि सबको एक समान शिक्षा मिले, समाज ने कभी सोचा कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा हमसे दूर क्यों जा रही है? अभिभावकों ने कभी सोचा कि आज इन अंग्रेजी माध्यमों में पढ़कर उनके बच्चों का नैतिक पतन कैसे होता जा रहा है और क्यों होता जा रहा है?
बिहार के समस्तीपुर जिले में मध्य विद्यालय सिवैसिंहपुर


#यहां, मैं यह जानकारी देना चाहूंगा कि सरकारी सरकारी विद्यालयों में पढ़ने लिखने के अलावे सरकार द्वारा प्रायोजित अनेक गतिविधियां संचालित की जाती है जिनमें शिक्षकों की अनन्य सहभागिता होती है जिससे शिक्षक अपनी पूरी तन्मयता से अपना पूरा ध्यान नहीं दे पाते।  इन सब उल_जूलुल कार्यों के लिए सरकार ही ज़िम्मेदार है। सरकार के शिक्षक सरकार द्वारा प्रायोजित लोक_लुभावन वोट बढ़ावन कार्यों को करते रहे कि बच्चों के बीच अपना कीमती समय बिताएं ?
#शिक्षा में आजतक जितने भी प्रयोग किए गए हैं शायद ही किसी अन्य क्षेत्र में इतने प्रयोग किये गए और यह भी सत्य है कि जितने अधिक अभिनव प्रयोग हुए, शिक्षा का उतना ही बेड़ागर्त होता चला गया एवं सबसे बड़ी बात यह है कि सार्वजनिक शिक्षा हो या सीबीएसई बोर्ड हो या आईसीएसई बोर्ड हो, सब की हालत एक ही जैसी ही है।
#आश्चर्य है!अंग्रेजी मीडियम के नाम पर खुलने वाले कुकुरमुत्तों की तरह उन तमाम स्कूलों में अंग्रेजी मीडियम के नाम पर बच्चों का ब्रेन ड्रेन होने और उनके अभिभावकों का आर्थिक शोषण होने के अलावे और कुछ भी नहीं होता। इन प्राइवेट विद्यालयों में एक_दो हज़ार की पुस्तकें अभिभावक चार_चार हज़ार में खरीदते हैं, अप्रशिक्षित शिक्षकों से अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाते हैं,

लेकिन अपनी चुनी हुई सरकार से प्रश्न नहीं कर सकते कि बाक़ी के हमारे पैसे किसकी कफ़न के जेबों में जा रहे हैं ?#अप्रशिक्षित_अल्पज्ञ लोगों से हमारे बच्चे को शिक्षा क्यों दिलवाया जा रहा है ? वहीं दूसरी तरफ शिक्षा आनन_फानन में वैसे लोगों द्वारा दी जा रही है जिनको यह भी नहीं पता कि शिक्षा देने_लेने का काम मुझसे मजदूरों से भी कम दाम देकर काम करवाया जा रहा है। सनद रहे शिक्षा देना और शिक्षक होना कोई बेरोज़गारी मिटाने का साध्य और साधन नहीं कि जिसको मन हो गया ,शिक्षा देने_ लेने लगे।

#इस अंग्रेजी शिक्षा ने इस देश के बाल मस्तिष्कों को इस तरह रटंत विद्या की आदत लगवा दिया जिससे बच्चों की सोचने समझने की शक्ति जाती रही। अब बच्चे रट_रट कर बैंकर, आईएएस, आईपीएस एवं अन्य कोई भी कंपटीशन निकालते जा रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं बनते क्योंकि वैज्ञानिक बनने के लिए समझ का विकसित होना जरूरी होता है जो हमारी शिक्षा पद्धति बच्चों में नहीं होने दे रही है।
#आश्चर्य है ! एक बच्चा जो सामाजिक विज्ञान के प्रश्नों को अपनी मातृभाषा में तो बड़ी कुशलता से जवाब देता है लेकिन उन्ही प्रश्नों के उत्तर वह विदेशी भाषा में ठीक से नहीं दे पाता क्योंकि उसकी समझ उस भाषा में नहीं बनती ।कभी गांधी, टैगोर ने भी कहा था कि मातृभाषा  बच्चों को शिक्षा देने का सशक्त माध्यम है, मातृभाषा को छोड़कर बाकी कोई भी भाषा यदि बच्चों के कक्षा कक्ष में प्रेरित किया जाता है तो यह बच्चों के लिए सरासर अन्याय है।
#सार्वजनिक विद्यालयों के बच्चे अपने परिवार के पहले जनरेशन  के बच्चे हैं जो विद्यालय आ रहे हैं। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे अपने घर के सारे काम करते हुए विद्यालय आते हैं। उनके अभिभावक भी इतने पढ़े लिखे नहीं कि उन पर वह  उचित ध्यान दे सकें...........!


राहुल_कुमार
#सार्वजानिक_प्राइमरी_विद्यालय_का_एक_प्रयोगधर्मी_