नम्रता
जब वाहवाही का लहू मुँह लग जाए तो फिर आम राय मशविरा मायने नहीं रखती। वही हाल है हमारे लोकतंत्र में भागीदारी निभाने वाले नेताओं की। कहने को तो लोकतांत्रिक सरकार चला रहे परंतु कहते हैं संकट की घड़ी में अपने परायों का इल्म हमें होता है " वही बात है यहाँ कि बच्चों के शिक्षा के नाम पर हो रही सियासत दरअसल चौखट पर दस्तक दे रहा चुनाव के मद्देनज़र खानापूर्ति को विद्यालय खोलने के लिए हमारी राय महज़ स्टंट से ज्यादा कुछ और नहीं।
हमारी सरकार को शिक्षा की चिंता कबसे हो रही। कहिये न कि निजी संस्था के दबाब में आप सरकारी स्कूल और निजी विद्यालयों के बच्चे और अभिभावक के जान को सकते में डालने का हर संभव प्रयास में लग रहे।
अब चलते हैं कुछ ऐसे पहलुओं पर जो जानना आवश्यक है।
क) अगर जानना ही था कि सबकी राय क्या है तो उस राजा की तरह बनते जो वेष बदलकर अपनी जनता का दुख सुना करता था।
ख) निजी विद्यालयों के अभिभावक खुले आम ट्वीटर पर हैशटैग चला रहे #noschooluntilcorona , वो अपने बच्चों को लेकर प्री एडमंट हैं कि नहीं भेजना है उन्हें उनके बच्चों को स्कूल लेकिन उन सरकारी स्कूल के गरीब बच्चों का क्या जो कि कोरोना काल में भी गांव के इलाके में बिना मास्क के दिन भर घूम रहे। गांवों में इतना भी लोगों को पता नहीं कि कोरोना कैसे फैल रहा,वो भी तब जब बिहार में लगातार प्रवासियों के आने से कोरोना केस बढ़ रहा। (रिपोर्ट के मुताबिक)
ग) जब हमारे शिक्षक ही कोरोना को लेकर जागरूक नहीं क्योंकि इसका प्रमाण मैं खुद हूं कि शिक्षक एक पैसा जागरूक नहीं हैं तो आप बच्चों से क्या अपेक्षा करेंगे। उसमें भी जब जुलाई अगस्त जैसे उमस भरे मौसम का आना बाकी है और दिनभर आप मास्क में बच्चों को किस तरह रखेंगे। और शिक्षक जबरन लगवाए भी तो वो मास्क खरीदेंगे कैसे जब वो अभावग्रस्त रहते हैं। उसमें भी बिहार के बच्चे तो चमकी से भी मरते हैं तो यहाँ के लोग भगवान का कहर मान सरकारों को दोषमुक्त कर फिर से वोट देने चले जाते हैं। हां वैसे सरकारों को जमीर कब से होने लगा जो मरेगी।
घ) आप अपने कर्मचारियों, पदाधिकारीयों से और आम जनता व बच्चों से ये सवाल पूछ रहे तो आप ही ये बताएं कि कोरोना के इस आर्थिक संकट के काल में किसको अपनी नौकरी गवानी है कि वो सही सुझाव आपको देंगे। वैसे भी बिहार के विद्यालय में शिक्षक, कर्मचारी और रसोइया सब स्कूल जा ही रहे तो फिर दुश्मनी किससे निकाल रहे!
च) लगभग कई रायशुमारी के रिपोर्ट का अवलोकन में 100% जवाब एक ही है कि जो स्कूल का आम दिनों का रूटीन है ठीक उसी को फौलो किया जाय तो फिर इसका यही मतलब है कि कोरोना समाप्त हो गया और स्कूल खोलने का निर्णय आप सभी के मत्थे मढ़ देना चाह रहे यदि कोई अनहोनी घटे।
छ) कोई भी सरकार से सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता क्योंकि निष्कासित का दंस जो झेलना पड़ेगा।
ज) वैसे भी बिहार सरकार को वाहवाही लूटकर रिकार्ड बनाने की लत लग चुकी है। लाॅक डाउन में मैट्रिक का रिज़ल्ट देना, एक सप्ताह में परीक्षा फल जारी करना, मानव श्रृंखला बनाना। आपको भी पता है जिह विद्यालय में आम वार्षिक रिज़ल्ट 25-30% नहीं होता वहीं +2 और मैट्रिक का रिज़ल्ट 85% होता है।
झ) भूख और चिकित्सा में निचले पायदान पर रहने वाला हमारा देश कोरोना में जल्द ही टाॅप पर पहुंच जाएगा क्योंकि देखते देखते छठे नंबर पर आ चुका है तब आप बच्चों को स्कूल बुला रहे। शिक्षा सरकारी ऐजेंडा में योजना से ज्यादा ग्यारह साल( शिक्षा का अधिकार) से कुछ और नहीं ये सभी को पता है।
ट) लगता है कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच आपसी सामंजस्यता का घोर अभाव है तभी शिक्षा मंत्री कह रहे कि सितंबर से पहले विद्यालय नहीं खुलेंगे और राज्य सरकार की बौखलाहट देखें तो मिड जून से नामांकन प्रारंभ करने का मन रहे और जुलाई से विद्यालय में पठन-पाठन आरंभ( यही सभी की राय है) मतलब हम जनता के लिए एक विशेषण देना हो तो आप देना पसंद करेंगे।
ठ) जहां 6/6, 8/8 का क्लास रूम में पचास बच्चे ठूसे जाते हैं और तो और कई भवनहीन विद्यालय भी चल रहे, कई विद्यालय एक वरामदे पर 1-8 तक की कक्षा एक शिक्षक के द्वारा संचालित होती है वहीं शहर से या दूर दराज़ से आने वाले शिक्षक ही कोरोना पाॅजिटिव हों तो ऐसे में क्या होगा। क्या शिक्षक कोरोना नहीं फैला सकते?
आप तो ये भी मानने को तैयार नहीं थे कि बिहार में कोरोना मरीज़ है। अगर जनता कर्फ्यू के दिन पटना में कोरोना मरीज़ की मौत को छिपा सकते थे तो आप ये छिपा जाते कि बिहार में भी कैरोना पाॅजिटिव है सच कोई नहीं बोलता है। सभी गलत सलाह देते हैं वो भी मौका की नज़ाकत और सलाह मांगने वाला कौन हो तो फिर वो खानापूर्ति के सिवाय कुछ नहीं होता है। जब देश और विद्यालय बंद करने से पहले नहीं पूछा गया तो अब ये नाटक क्यों।
विद्यालय खोलने के लिए किसी सरकार के पास अभी कोई किसी तरह की तैयारी नहीं है। न ही कोरोना के लिए दवाई ही बन पायी है और जिस तरह ये दिन दुनी रात चौगुनी मरीज़ की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा तो ये कहना उचित होगा कि देश के भविष्य को मौत के मुँह में न ढकेलें। जो संभालनी है वो है अर्थव्यवस्था और उसके लिए जितनी राय लेनी है आप साल भर मांगते रहें कोई प्रश्न चिह्न नहीं आपके मनसा के ऊपर लगाएगा लेकिन इतना बड़ा निर्णय के लिए आम मत मांगना घोर अपराध के अलावा कुछ नहीं होगा क्योंकि कई देश बच्चों पर प्रयोग कर निर्णय वापस ले रहे। कहीं आप भस्मासुर न साबित हो जाएं।।





